Wednesday, January 18, 2012

रेत का एक ज़र्रा

वो रेत का एक ज़र्रा था,
साहिल पे उसने उम्मीदों के बड़े अजब से मंज़र देखे थे,
कुछ ही कदमों की दूरी पर उसने तो समुन्दर देखे थे,
सूरज की तपती लौ में उसका सूनापन रोज़ ही सिंकता था,
अपने सीने हाथ फेर कर तन्हाई के वो किस्से लिखता था,
इक दिन इक लहर भूल के रस्ता रेत के घर तक चढ़ आई ,
सागर ने रोका लाख उसे पर मौज में वो बरबस बढ़ आई,
भीगा जो उसका जिस्म ज़रा तो रेत का रूप ही बदल गया,
और लहर के ज़रा से छूने से उसका तो संयम फिसल गया,
उस पर पानी का नशा चढ़ा ,मदहोश हो के थिरकने लगा,
अपनी ज़मीन से होके जुदा अपने वजूद से सरकने लगा,
पर लहरें कब साहिल पे रुकी जब सागर ने उन्हें खींचा है,
वो भूल गयी उसने जा कर कितने ख्वाबों को सींचा है,
वापस वो अपने गाँव चली बल खाते हुए वो इतराते हुए,
महल रेत का गिराते हुए,उस रेत को इतना जताते हुए
वो रेत का एक ज़र्रा ही तो था...


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