Saturday, November 29, 2008

लश्कर ...

दहशतों का शोर कुछ देर ज़रा बंद करो,

सुनाई देती नही दिल की अब पुकार मुझे ,

खामोश निगाहों की जुबान को ज़रा पढ़ के देखो,

किसी बगावत के नज़र आते हैं आसार मुझे,

ज़ुल्म के दौर में रहम की अब उम्मीद कहाँ,

अब तो वहशतों का रहता है इंतज़ार मुझे,

मंदिरों मस्जिदों में भी भीड़ नही दिखती देती ,

वो खुदा भी नज़र आता है लाचार मुझे,

नफरतों ने दिलो पे जा के फतह कर ली है,

प्यार की ताक़त पे नही रहा अब ऐतबार मुझे,

अमन की कीमतें लहू से चुकानी होगी,

नही मंज़ूर कोई ऐसा अब करार मुझे ,

जज्बो की बारूद और असलहे हो लफ्जों के,

इन्ही से करना है लश्कर कोई तैयार मुझे

Wednesday, October 1, 2008

कद्र कीजिये.....

बगैर मन्नतों की इबादत की कद्र कीजिये,

बेवजह याद करने की आदत की कद्र कीजिये,

बेखौफ चले आते हैं ये दिल से निकल कर,

थोड़ा तो इन लफ्जों की हिमाकत की कद्र कीजिये,

बरसों पुरानी होके भी ये महक रही हैं,

यादों की ताजगी की हिफाज़त की कद्र कीजिए,

ख्वाइश मुक्कमल हो जाए इतनी सी है ख्वाइश,

रवाएतो से इनकी बगावत की कद्र कीजिये,

दर्द मेरे सभी हैं अब आपके सुपुर्द,

ख़ुद ही आप अपनी अमानत की कद्र कीजिये,

जुदाई में ही मुमकिन था इस रिश्ते का वजूद,

कुछ तो इस रिश्ते की नजाकत की कद्र कीजिये,

Sunday, September 21, 2008

कोई ज़रूरी तो नही....

हर ग़म को अपने गले लगाना कोई ज़रूरी तो नही,

आँखों से आंसू पल पल गिराना कोई ज़रूरी तो नही,

दर्द हजारों रह सकते हैं इस दिल की आहों मे छुप कर,

चेहरे पे उनकी नुमाइश लगाना कोई ज़रूरी तो नही,

अपनी इबादतों पे यकीं करता हूँ मैं बस इतनी ख़बर है,

खुदा का मुझ पर मेहर लुटाना कोई ज़रूरी तो नही,

अपनी मंजिल का तो पता पूछ ही लूँगा अंधियारे से,

धुप का मेरी राह चमकाना कोई ज़रूरी तो नही,

वक़्त सहला के कर देता है सारे ज़ख्मों का इलाज,

बातों का उनपे मरहम लगाना कोई ज़रूरी तो नही,

हकीकतों की ज़मीं पे गहरी नींद सो लेता हूँ मैं ,

ख्वाबों की इसपे चादर बिछाना कोई ज़रूरी तो नही,

उम्र के इस मुकाम पे जो खुदगर्ज़ हो चले हैं,

उन रिश्तों का बोझ उठाना कोई ज़रूरी तो नही,

Sunday, August 31, 2008

नज़र आता है......

क्यूँ नही चेहरे पे मेरे ग़म नज़र आता है,
क्या करें लोगों को थोड़ा कम नज़र आता है,

निगाहें बयां कर देती हैं इंसान की फितरत,
शकल से तो हर शख्स हमदम नज़र आता है,

मायूसियों की धुप है, उदासियों की बारिश,
ये तो कोई नया ही मौसम नज़र आता है,

शायद सारी रात रोये हैं ये सपने जाग के,
आँखों का बिछौना कुछ नम नज़र आता है,

ये ज़ख्म तुम्हारी ओर बड़ी उम्मीद से देखते हैं,
बातों में तुम्हारी इन्हें मरहम नज़र आता है,

अपनी इबादतों पे फ़िर से यकीन कर के देखें,
इनके हौसले में अब भी दम नज़र आता है,

Tuesday, August 26, 2008

ज़रा सी ज़हमत और सही...

जुबान पे ला के रिश्ते को रुसवा नही करना ,
जहाँ से नज़रें चुरा के निगाहों से उतरना,

थक के मेरे सीने में जा सो गया है वो,
उस दर्द पे पाँव रख के तुम अब न गुज़रना,

ऑंखें न बन सकेंगी अब उनकी मेज़बान,
कह दो अपने ख्वाब से वो आए इधर न,

बरसों से दिल में फक्र से रहते थे जो लम्हे, ,
अब ख़ुद ही चाहते है वो खुल के बिखरना,

अब वहां पे कोई मेरा आशियाँ नही,
यादों के शहर जाके कहीं और ठहरना

Monday, August 18, 2008

नई सुबह

आज सुबह से पुछा मैंने इतना क्यूँ मुस्काती हो,
रोज़ रोज़ इक नई ज़िन्दगी कहाँ से ले कर आती हो,

कभी तो लाये धुप सुनहरी कभी रुपहले बादल तू,
और कभी फ़िर ओढ़ के आए सतरंगी सा आंचल तू,

कभी हवा में छिपा के खुशबु फूलों तक ले जाती हो,
और रंग फूलों के चुरा के घर घर तुम पहुंचाती हो,

कभी चहकती नदी में बहती आशाओं की नाव बने,
कभी निराशाओ के पल में उम्मीदों की छाँव बने

कभी ओस की चादर बन तुम अंधियारे ढक लेती हो,
और रौशनी को उसकी आज़ादी का हक देती हों

इन आँखों से नींद उड़ा के सपने तुम भर देती हो,
उन सपनो को राह दिखा कर पल में सच कर देती हो

Wednesday, July 23, 2008

जो आप हमें न मिलते...

मेरे अरमानों के कदम तो ख़ुद से कभी न हिलते,

कुछ अलग जिंदगी हो जाती जो आप हमें न मिलते,

ना कुछ पाने की चाहत और न कुछ खोने की चिंता,

न रातों को जाग जाग मैं अपनी धड़कन को गिनता,

छूट के मेरे हांथों ये पल ना राहों में बिखरते,

उन सारे लम्हों को भला क्यों ढूंढ ढूंढ मैं बिनता,

यादों के धागों से तन्हाई के ज़ख्म न सिलते,

कुछ अलग जिंदगी हो जाती जो आप हमें न मिलते,

न चाहत के के दिए चमक कर इन आँखों में जलते,

उजाले से सपने आकर ना इन आँखों में पलते,

ना सुबह और रात के दरम्यान इतनी दूरी होती,

उमर गुज़र जाती पूरी इक दिन के ढलते ढलते,

लफ्जों के ये फूल मेरे इन होठों पे ना खिलते,

कुछ अलग जिंदगी हो जाती जो आप हमें ना मिलते,

सपने पकते हैं...

थक कर के उम्मीद कहीं सो जाती हैं,
खामोश सदायें शोर में खो जाती हैं,
हँसते हैं जब ग़म हमारी हालत पे,
खुशियाँ पलकों के पीछे रो जाती हैं,

भीगी आँखों से किसी की राह तकते हैं,
आंसुओं की गर्मी में ही सपने पकते हैं,

हौसले मौजों के जब साहिल पे रुकते हैं,
अंधेरों से डर कर के साए भी छुपते हैं,
जिन ज़ख्मों ने ओढी थी वक्त की चादर,
यादों के झोंके आने से वो भी दुखते हैं,

दिल से आँखों की तरफ़ कुछ ज़ख्म सरकते हैं,
आंसुओं की गर्मी में ही सपने पकते हैं,

ये दर्द आख़िर क्यूँ इतनी तकलीफें सहता है,
ख़ुद से ही सहमा सा चुप चाप रहता है,
झांकता है होठों से कभी आह ये बनकर,
या फ़िर बनकर इल्तिजा आँखों से बहता है,

लफ्ज़ इसको अपनाने में क्यूँ झिझकते हैं
आंसुओं की गर्मी में ही सपने पकते हैं,

तू जो कहे तो,

तू जो कहे तो अपनी ऑंखें ग़म से तेरे नहला दूँ मैं,
तेरे दुखते सपने अपनी पलकों से सहला दूँ मैं,
तनहा तनहा दिल जो तेरा खोया है किस उलझन में,
अपने दिल के पास बिठा कुछ देर उसे बहला दूँ मैं,

तू जो कहे तो तेरी उदासी थाम लूँ अपने हाथों से,
दर्द को तेरे कुछ समझाऊँ प्यार भरी इन बातों से,
चमकीली सी धूप कभी जो चहरे को सताए तो,
चांदनी का आँचल तब मैं मांग के लाऊं रातों से,

तू जो कहे तो बातों को तेरी अपनी जुबान से जोडू मैं,
अपनी मुस्कानों को तेरे लबों की तरफ़ अब मोडू मैं,
अपने मन के सूनेपन तक इनको तुम आ जाने दो,
तेरी खामोशी को अपने लफ्जों से फ़िर तोडू मैं,

इतिहास बदल जाता है

वक्त बदलने निकली हुई हवा के जादू से,

ओस की चादर ओढे हुए फूलों की खुशबु से,

नई किरण सुबह की गोद में महकती है,

धुप ज़मीं पे लेट के पल पल चहकती है,

देहलीज़ पे खड़ी खुशियों की आवाज़ को सुनकर,

पहनती है ये ऑंखें नया सपना इक बुनकर,

एक कदम तारों की तरफ़ मुझ से उठवाती हैं,

नयी लकीरें हाथों पे उनसे खिंचवाती हैं,

जागते हैं कुछ हौसले तब नींद से उठकर,

थमती है उम्मीद उनके हाथों को बढ़कर,

रौशनी में नहा कर वो लिबास बदल जाता है,

और यूँ ही जिंदगी का इतिहास बदल जाता है,

Friday, July 18, 2008

एक बार फ़िर...


एक बार फ़िर सपना बन पलकों पे सजने आओ तुम,
एक बार फ़िर मेरे दिल को आ कर के बहलाओ तुम,


एक बार तुम फ़िर से देखो आकर मुझको पहली बार,
एक बार मैं फ़िर जानू कैसा होता है पहला प्यार,


एक बार फ़िर उम्मीदों को आसमान पे सजने दो,

इन्द्रधनुष के रंग की धुन पर गीत प्यार का बजने दो,


एक बार फ़िर हाथ पकड़ कर संग चलो तुम थोडी दूर,
एक बार फ़िर कर लेने दो को मुझ को तुम ख़ुद पे गुरूर,


एक बार बातों को मेरी थोड़ा चुप रह जाने दो,

मेरी खामोशी का मतलब मुझको समझाने दो,


बुझती आशा के दीपक फ़िर से जीवन दान दो,
मेरी अभिलाषा को फ़िर से थोड़ा सा अभिमान दो,

एक बार फ़िर रूठो मुझसे और फ़िर मुझे मनाने दो,
इसी बहाने को सच को मेरे होठों तक आ जाने दो,


एक बार तस्वीर में अपनी रंग प्यार का भरने दो,
मेरे सपनो की रंगत को थोड़ा और संवरने दो,


एक बार तुम थोड़ा कह से ज़्यादा मुझे सुन लेने दो,
अपनी चाहत के लम्हों को फ़िर से मुझे चुन लेने दो,


बन जाओ तुम मेरी प्रेरणा गाने की मुस्काने की,
एक बार फ़िर जीवित कर लूँ ख्वाहिश तुम को पाने की,



Wednesday, May 14, 2008

तुम बिन

तुम बिन मेरा जीवन कुछ ऐसा हो जाए,

हाथ से उसकी रेखाएं जैसे खो जाएं

जैसे गीत को उसकी सरगम ना मिल पाये,

जैसे सुबह बिना सबा के ही खिल जाए

जैसे कोई चांदनी बिन रात के हो,

जैसे सूनी जुबान बिन बात के हो

जैसे मिलकर बिछुड़े मन के अपने हो,

जैसे आंख से रूठे उसके सपने हों

जैसे बारिश से हो उसकी बूंदे जुदा,

जैसे बिना इबादत के हो कोई खुदा

जैसे तारों से खफा जगमग हो जाए,

और ज़ख्म से दर्द कभी अलग हो जाए

जैसे नशे से छीन ले कोई उसका सुरूर,

कोई कैसे रह सकता है ख़ुद से दूर




Sunday, May 4, 2008

बहुत साल पहले

ना स्वर की आई थी समझ और न शब्दों का ज्ञान था,
फ़िर भी माँ कह पाना तुझको माँ कितना आसान था,

मिश्री में घुली लोरी सुन जब नींद मुझे आ जाती थी,
सुंदर से सपने तुम मेरे तकिये पे रख जाती थी,

मेरी ऑंखें देख के मन की बातें तुम बुन लेती थी ,
मेरी खामोशी को जाने तुम कैसे सुन लेती थी,

मेरी नन्ही उंगली तेरी मुट्ठी मे छिप जाती थी,
कितनी हिम्मत तब मेरे इन क़दमों को मिल जाती थी,

चोट मुझे लगती थी लेकिन दर्द तो तुम ही सहती थी,
मेरी आँखों की पीड़ा तेरी आँखों से बहती थी,

तेरे आँचल मे छुपने को मन सौ बार मचलता है,
माँ तेरी गोदी में अब भी मेरा बचपन पलता है




Tuesday, March 25, 2008

चंद शेर

१। कब तक यूं ही तन्हा तनहा ख्वाबों मे सैर होगी,

बड़ी दुशवार अब नींद भी तेरे बगैर होगी,

तुम अपने लम्हों को ज़रा मेरे वक्त से आकर जोडो,

तुम साथ होगी तब ही तो इस शब की खैर होगी

२। बड़ी रफ़्तार से वक्त और हालात बदलते हैं,

पल भर में ही लोगो के जज्बात बदलते हैं,

जिन लबों पे नाम मेरा रहता था मुस्तकिल,

मेरा ज़िक्र आते ही अब वह बात बदलते हैं

३। क्यों बेवफाई का सबक मुझको सिखा दिया,

बागियों की फेरहिस्त में मेरा नाम लिखा दिया,

खुश्फहमियों के सराब में जी रहा था में,

क्यों हकीकत का आइना मुझको दिखा दिया

Monday, March 17, 2008

तेरी ऑंखें जादू करती हैं

तेरी ऑंखें जादू करती हैं,
तेरी ऑंखें जादू करती हैं


कुछ मुस्काती ,कुछ रोई सी,

कुछ अलसाती कुछ सोई सी,

कुछ यादों में हैं उलझी सी,

कुछ सपनो मे हैं खोई सी



इनके आगे ही झुक झुक कर ,

तेरी पलकें सजदा करती हैं,



तेरी ऑंखें जादू करती हैं,

तेरी ऑंखें जादू करती हैं



इनमे दिन हैं और रातें हैं,

खामोशी है और बातें हैं,

इनमे हैं जुदाई के लम्हे,

और इनमे ही मुलाकातें हैं,


वक्त भी रुक सा जाता है ,

इक पल ये जहाँ ठहरती हैं,



तेरी ऑंखें जादू करती हैं,

तेरी ऑंखें जादू करती हैं



ये खुशबु को महकाती हैं,

और खुशियों को चहकाती हैं,

हर रात नशीली कर के ये

ख्वाबों को बहकाती हैं,


पलकों के पीछे चुप करके ,

मासूम खताएं करती हैं,


तेरी ऑंखें जादू करती हैं,

तेरी ऑंखें जादू करती हैं















Saturday, March 15, 2008

मर्ज़-ऐ-खुदगर्जी

किस बात का है हम को मलाल पूछते हैं
ज़ख्मों से दर्द की मिसाल पूछते हैं,

हर सितम पे बनती है जिनकी जावाबदेही,
मासूमियत भरे वो सवाल पूछते हैं

राहों को पत्थरों से दुशवार बना के ,
लडखडाती क्यों है वो चाल पूछते हैं

ख़ुद अपनी गवाही पे ले कर के फैसले,
क्या है आवाम का ख्याल पूछते हैं

खुदगर्जी के मर्ज़ से बीमार हो चले हैं,
और लोगों की तबियत का हाल पूछते हैं



Friday, March 14, 2008

एक दूसरा जहाँ ...

मोहब्बत की दुनिया के आगे इक और जहाँ हो सकता है,
कुछ और ही कह के पुकारो इसे यह प्यार कहाँ हो सकता है

जाने क्यों हम इन नग्मों को होठों पे सजा के फिरते हैं,
वैसे तो यह पूरा अफसाना आँखों से बयां हो सकता है

आसां तो नहीं है इतना भी यादों की किताबें पढ़ लेना,
किसी भी पन्ने पर हिसाब ज़ख्मों का निहां हो सकता है

ज़रूरी नहीं की इस दिल मे हसरत के शोले दहकते हों,
जो दिखता है वो बुझती हुई ख्वाइश का धुआं हो सकता है,

लोग मेरी इन आँखों मे क्यों तुमको ढूँढा करते हैं,
पलकों पर बाकी अब तक तेरे ख्वाबों का निशान हो सकता है,

तुम अपनी बेवफाई पे अब मुझको यकीन आ जाने दो,
वरना फ़िर तेरी मोहब्बत का मुझको भी गुमान हो सकता है

Sunday, January 13, 2008

कर्जों की आशनाई

कर्जों की आशनाई मे हालात ये हुए ,
होठों पे अब हंसी भी बस उधार की खिलती है;

नुक्कड़ के दर्जी मेरे सब दोस्त बन गए,
कि इज्ज़त फटी हुई उसी दुकान पे सिलती है;

नज़र आती हैं आपको जो बुलंद इमारतें,
तंगी के ज़लज़लों से उनकी बुनियादें हिलती हैं;

पैबंद लगी जेब मेरी शर्मिंदा सी रहती है,
ज़माने की तल्खियों से उसकी खवाहिशें छिलती हैं

लगती है घर पे मेरे महफिल मुफलिसी की,
जितनी चाहे ले लो ख़ुशी मुफ्त मे मिलती है;

Tuesday, January 8, 2008

तेरी मुस्कानों कि खातिर......

तेरी मुस्कानों कि खातिर इतना तो किया जा सकता है,
चहरे से छलकता दर्द तेरा हाथों मे लिया जा सकता है;

बातों के कच्चे धागों से ये ज़ख्म कहाँ भर पायेंगे,
कुछ ज़ख्मों को बस प्यार भरी नज़रों से सिया जा सकता है;

है बात बड़ी शाइस्ता सी , तुम इसको खता मत कह देना,
रुखसार पे बिखरे अश्कों को होठों से पिया जा सकता है;

मसरूफ हूँ अपनी उलझन मे पर इतना भी खुदगर्ज़ नही,
तेरी तन्हाई को इक लम्हा फुरसत का दिया जा सकता है;

अपने ख्वाबों के साथ मेरी आँखों मे बसने आ जाओ,
तुम को शायद मालूम नही ऐसे भी जिया जा सकता है

दर्द झांकता है...

ज़िंदगी से थकी हुई आँखों को मींच कर,
दर्द की शाखों को आंसुओं से सींच कर,
रोज़ रात, रात को, रात भर जागता है,
पलकों से भीगा हुआ दर्द झांकता है;

यादों की गठरी मे मुस्काने समेट के,
ख्वाबों कि चादर मे ग़म को लपेट के,
वक़्त की खूँटी पे तकदीर टागता है,
भीतर से बिखरा हुआ दर्द झांकता है;

मायूसी को हौसले के खिलोने से बेहलाकर,
बेबसी के हाथों को बाज़ार मे फैला कर,
ज़ख्मों को सहलाने की भीख मांगता है
जिस्म से छिला हुआ दर्द झांकता है;

ख्वाइश दिल मे .....

ख्वाइश दिल मे बहुत रह चुकी अब तो जुबान तक पहुंचे,
कह दो उम्मीदों से अब वो आसमान तक पहुंचे;

मैं निकल पड़ा हूँ खुद के भरोसे अब अपनी मंजिल की तरफ,
किस्मत का यकीं कहाँ कब मेरे मकान तक पहुंचे;

दम तोड़ते हैं हौसले दो चार कदम चल के,
कामयाबी पहुंची उन तक जो इम्तेहान तक पहुंचे;

उगते हैं अरमानों के पंख दिल के मैदानों मे,
नादाँ है जो उन्हें खरीदने किसी दुकान तक पहुंचे;

ले चलें बुलंदियों तक इसे कि इस का ये हक है,
इस से पहले ये ज़िंदगी अपनी ढलान तक पहुंचे;

खुदा कि रहमत तब होगी जब खुद से ज़हमत होगी ,
उस को कहाँ फुरसत कि वो हर इंसान तक पहुंचे;

इक सपना सुबह से मांगें....

इक सपना सुबह से मांगें,
और पलकों पे उस को टांगें,
दिन भर उसे धुप मे सेंकें,
फिर रात मे उस को देखें;

इक मीठा सा नग्मा चख कर,
कुछ पल उसे दिल मे रख कर,
उसे सरगम मे नेहलायें,
फिर होठों पे फेहरायें;

जब तनहा लगें ये रातें,
तब चांद से कर के बातें,
हम तारों को लायें नीचे,
और रंगों से उनको सींचें;

हम जेब मे ले के उम्मीदें,
कुछ खुशियाँ जहाँ से खरीदें,
फिर नींद मे उनको घोलें,
और रख के सिरहाने सो लें;

Thursday, January 3, 2008

कभी हम...

कभी हम दिल से कहते हैं,
कभी खामोश रहते हैं,
तेरी चाहत में भीगे लफ्ज़,
कभी आंखों से बहते हैं:

कभी हम गुनगुनाते हैं ,
कभी सपने सजाते हैं,
तेरा ख्याल जब आये,
तभी हम मुस्कुराते हैं:

कभी तुम मेरी यादों को घर अपने बुला लेना,
मेरे ख्वाबों को तुम अपनी आंखों में सुला लेना,
तनहा सी मेरी साँसे बस यूं ही भटकती हैं,
कभी तुम अपनी खुशबू को ज़रा इनसे छुला लेना ;